गुरुवार, 15 जनवरी 2015
जख्म दिल के
जहर से कुछ भरे भी होते हैं‚
लोग थोड़े बुरे भी होते हैं।
वक्त पर सब खड़े नहीं होते‚
दोस्त कुछ तो खरे भी होते हैं।
जो हैं कहते के हम नहीं डरते‚
वह यकीनन डरे भी होते हैं।
गुफ्तगू हो तो जिंदा मत समझो‚
उनमें कुछ तो मरे भी होते हैं।
दोस्त सबको समझना ठीक नहीं‚
भेस दुश्मन धरे भी होते हैं।
वक्त के साथ सब नहीं भरते,
जख्म दिल के हरे भी होते हैं।
‘राज’ करते हैं जो बड़ी बातें‚
लोग ऐसे गिरे भी होते हैं।
बुधवार, 15 अक्टूबर 2014
तुम्हारी आंखें
दिल के खाने में उतर जाती हैं प्यारी आंखें,
छीन लेती हैं हमें हमसे तुम्हारी आंखें।
एक नशा हम पे भी छा जाता है तुमसे मिलकर,
खूब भाती हैं हमें तेरी खुमारी आंखें।
हार बैठा हूं तेरे प्यार में दिल की बाजी,
जीतने देती नहीं मुझको जुआरी आंखें।
क्या असर प्यार में होता है,पता आज चला,
प्यार के रंग में दिखती हैं पुजारी आंखें।
फासले से तो बहुत शोख नजर आती हैं,
रू-बरू बनके जो रहती हैं बेचारी आंखें।
क्या पता तुमको के फुरकत में गुजरती क्या है,
ढूंढती रहती हैं तुमको ये हमारी आंखें।
सोमवार, 13 अक्टूबर 2014
नाम उसका है
मैंने माँगा जिसे दुआओं में,
नाम उसका है बेवफाओं में.
या खुदा कैसा दौर आया है,
दर्द ही दर्द है सदाओं में.
वक़्त ने उनके पर क़तर ही दिए,
उड़ते रहते थे जो हवाओं में.
उम्र भर कुछ न कर सके हासिल,
हम जो उलझे रहे अदाओं में.
उस-सा कोई,कहीं मिला न मुझे,
लाख ढूंढा उसे खुदाओं में.
"राज" क्यों दुश्मनो से डरते हो,
ज़हर तो है यहाँ हवाओं में.
बुधवार, 18 दिसंबर 2013
जिंदा रहना है तो
जंग हालात से हर हाल में करना होगा,
जिंदा रहना है तो लड़ते हुए मरना होगा।
हमने माना के हैं हालात मुखालिफ लेकिन,
आग भी हो तो हमें आग पे चलना होगा।
बेजबानों पे सदा जुल्मो-सितम होता है,
हम खड़े होंगे तो फिर जुल्म को डरना होगा।
आरजू है जो फलक पूछे हमारी ख्वाहिश,
इम्तहानों से हमें रोज गुजरना होगा।
है ये दस्तूर तो दस्तूर बदलना होगा।
रह के खामोश जमाने में नहीं हक मिलता,
प्यार से बनती नहीं बात तो लड़ना हो्गा।
अज्म जनता जो करे और उठा ले परचम,
बिगड़े हालात को पल भर में सुधरना होगा।
रविवार, 8 दिसंबर 2013
शनिवार, 7 दिसंबर 2013
खो रहा है वो
जाने क्यों आज सो रहा है वो‚
वक्त बेवजह खो रहा है वो।
मौत का वक्त तय तो है लेकिन‚
सुबह से बैठा रो रहा है वो।
आरजू तो है सिर्फ फूलों की‚
पेड़ कांटों के बो रहा है वो।
जो गया लौट कर न आएगा‚
वक्त हासिल क्यों खो रहा है वो।
साथ कैसे चलेगा दुनिया के‚
कल को कांधे पे ढो रहा है वो।
स्याह किरदार हो गया है मगर‚
दाग दामन के धो रहा है वो।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)






