मैं यादों के समंदर में ,
जो डूबा हूँ तो ज़िंदा हूँ।
तुम्हारे ज़िक्र की तस्बीह,
पढ़ता हूँ तो ज़िंदा हूँ।
मैं अक्सर रात में तन्हा,
तेरी तस्वीर तकता हूँ,
कभी तुमने लिखे थे जो,
वही तहरीर तकता हूँ,
तुम्हारे बाद ये थोड़े,
सहारे हैं तो ज़िंदा हूँ।
तुम्हारे बाद भी जाने,
है रिश्ता क्या तेरे घर से,
नहीं हो तुम मगर फिर भी,
गुज़रता हूँ तेरे दर से,
तेरी गलियों,तेरे कूचे ,
में चलता हूँ तो ज़िंदा हूँ।
कभी मुझको हंसाते हैं,
कभी मुझको रुलाते हैं,
तुम्हारे साथ गुज़रे पल,
बहुत ही याद आते हैं,
तेरी यादों के पन्ने जो,
पलटता हूँ तो ज़िंदा हूँ।
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018
तेरी यादों के पन्ने
शुक्रवार, 2 मार्च 2018
रंग बिखरे हज़ार होली में
शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017
जिंदगानी है.
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इश्क की फिर वही कहानी है,
एक दीवाना,इक दीवानी है.
इश्क हर दौर में रहा है जवां,
बात समझो न यह पुरानी है.
सिर्फ रूठो न यार समझो भी,
चार दिन की ही बस जवानी है.
हमने अब भी संभाल रखा है,
पास जो भी तेरी निशानी है.
तेरी यादों ने घेर रखा है,
शाम फिर आज कुछ सुहानी है.
पूरी दुनिया न तोड़ पायेगी,
दिल का रिश्ता तो आसमानी है.
'राज'उसने सही कहा था कभी,
साथ हो तुम तो जिंदगानी है.
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عشق کی پھر وہی کہانی ہے،
ایک دیوانہ ، اک دیوانی ہے
عشق ہر
دور میں رہا ہے جواں،
بات سمجھو نہ یہ پرانی ہے
صرف روٹھو نہ یار سمجھو بھی،
چار دن کی ہی بس جوانی ہے
ہم نےاب بھی سنبھال رکھا ہے،
پاس جو بھی تیری نشانی ہے.
تیری یادوں نے گھیر
رکھا ہے،
شام پھر آج کچھ سہانی ہے
پوری دنیا نہ توڑپاۓ گی
دل کا رشتہ تو آسمانی ہے.
'راج'اس نےصحیح کہا تھا کبھی،
ساتھ ہو تم تو زندگانی ہے.
रविवार, 12 नवंबर 2017
मेरा दिल तो है.
शनिवार, 25 फ़रवरी 2017
रविवार, 13 नवंबर 2016
मां का काला धन
उथला-पुथला सारा घर है,
मां का काला धन बाहर है।
खाकर अक्सर आधा-थोड़ा,
अपनी इच्छा मार के जोड़ा,
वो धन भी अब उसका नहीं है,
वाकिफ उससे सारा घर है,
मां का काला धन बाहर है।
बेटी की शिक्षा की खातिर,
शादी का खर्चा है जाहिर,
सबके लिए था सोचा मां ने,
अब उसके बंटने का डर है,
मां का काला धन बाहर है।
गुस्सा उस पर पति शराबी,
खुश है उसका बेटा जुआरी,
और सरकार के प्रश्न भी होंगे,
उसके धन पर सबकी नजर है,
मां का काला धन बाहर है।
घर की मरम्मत भी करनी थी,
फीस डाक्टर की भरनी थी,
मायके में भी कुछ खर्चा था,
अब तो आगे कठिन डगर है,
मां का काला धन बाहर है।
शनिवार, 12 नवंबर 2016
जी का जंजाल
इस हुकूमत में हमारा मुल्क ये बेहाल है,
जेब में पैसा है फिर भी आदमी कँगाल है.
पैन, के वाई सी ,आधार,महंगाई, मौसम का कहर,
देश की जनता की खातिर हर तरह का जाल है.
हर कोई उलझा हुआ है,हर कोई बेचैन है,
एम पी ,यू पी ,दिल्ली चाहे,चाहे फिर बंगाल है.
बस क़तारों में गुज़रती है हमारी सुबह-ओ-शाम,
किस जगह का नाम लूँ हर जगह ये हाल है.
अब बिना आधार के होता नहीं है कोई काम,
हर तरफ आपात है निर्बलों का काल है.
क्या कहें उसको बताओ जो किसी की न सुने,
आदमी मानें उसे या मान लें बेताल है.
अच्छे दिन का देखकर सपना बनाया था मगर,
मोदी की सरकार यारों जी का बस जंजाल है.
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