शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्यार में जीना


प्यार में जीना,प्यार में मरना,
प्यार बिना क्या जीकर करना।
प्यार की खुशबू  से है यारों,
दिल की धड़कन,सांस का चलना।
प्यार से दुनिया है गर्दिश में,
शम्सो-कमर का चलना,चमकना।
प्यार से कुदरत में रंगत है ,
हवा की सर-सर, कली का खिलना।
प्यार में बहता नहीं लहू है ,
प्यार नई करता है रचना।
 प्यार किया तो प्यार जता दो,
इजहार में देर न करना।
प्यार में रहकर दूर सनम से,
तय है दिल का 'राज' तड़पना।

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

चाँद का दीदार


चाँद का जब मुझे दीदार नज़र आता है,
रास्ता इश्क का गुलज़ार नज़र आता है.
मेरी कोशिश,मेरी ख्वाहिश,मेरा मकसद यारा,
तेरी जुल्फों में गिरफ्तार नज़र आता है.
हुस्न के नाजो-अदा की है निराली दुनिया,
उनकी ना-ना में भी इकरार नज़र आता है.
याद आता है सफ़र में जो तुम्हारा चेहरा,
राह मुश्किल में भी हमवार नज़र आता है.
मैंने माना के ज़माना यह हसीं है लेकिन,
तू नहीं है तो यह बेकार नज़र आता है.
तुझसे रिश्ता नहीं यूँ ही के भुला दूं तुझको,
दिल का तुमसे ही जुड़ा तार नज़र आता है.
हाल क्या अपना बताऊँ,तू समझ ले कासिद,
आँख खोलूँ तो वह हर बार नज़र आता है.
चश्मे-उल्फत में अजब जोर है देखा मैंने,
लाख पर्दा हो मेरा यार नज़र आता है.
मुस्करा कर न चुरा राज से नज़रें अपनी,
तेरी आँखों में ही संसार नज़र आता है.

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

हवा सियासत की

चल रही है हवा सियासत की,
कौन बातें करे मोहब्‍बत की।
दोस्‍त सारे बदल गए आखिर,
कुछ हवा ऐसी है अदावत की।
बेअसर उन पे आरजू-मिन्‍नत,
बात हो जाए अब बगावत की।
दर्दे-इंसानियत से खाली हैं,
बात करते हैं जो इबादत की।
आम इंसां से दूर रहते हैं,
 दिल में ख्‍वाहिश है पर इमामत की।
बात इंसाफ की न कर पाए,
क्‍या जरूरत है इस सहाफत की।
काम नाअहल पा रहे हैं अब,
क्‍या घड़ी आ गई कयामत की।
है गए दौर की मगर फिर भी,
बात हो जाए कुछ नजाकत की।
सबको मालूम है सवाब मगर,
किसको फुर्सत है अब अयादत की। 
राजतसलीम अब तो कर ही लो,
कद्र होती नहीं शराफत की।

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

हवाओं में ज़हर.


ज़िन्दगी मेरी है यारों मुख़्तसर,
 आपकी मर्ज़ी बनायें रोज़ घर.
  आप चाहे लाख तदबीरें करें,
  लौट पायेगी नहीं गुजरी सहर.
  हमने उनके हर सितम हंसकर सहे,
  हम ही ठहराए गए मुजरिम मगर.
  आइए पौधे लगायें प्यार के,
  घुल गया है अब हवाओं में ज़हर.
   मज़हबो-फिरका में है जबसे बंटा,
   जल रहा है दोस्तों सारा शहर.

जख्म दिल के




    जहर से कुछ भरे भी होते हैं‚
    लोग थोड़े बुरे भी होते हैं।
    वक्त पर सब खड़े नहीं होते‚
    दोस्त कुछ तो खरे भी होते हैं।
    जो हैं कहते के हम नहीं डरते‚
    वह यकीनन डरे भी होते हैं।
    गुफ्तगू हो तो जिंदा मत समझो‚
    उनमें कुछ तो मरे भी होते हैं।
    दोस्त सबको समझना ठीक नहीं‚
    भेस दुश्मन धरे भी होते हैं।
    वक्त के साथ सब नहीं भरते,
    जख्म दिल के हरे भी होते हैं।
    ‘राज’ करते हैं जो बड़ी बातें‚
    लोग ऐसे गिरे भी होते हैं।

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

तुम्‍हारी आंखें



दिल के खाने में उतर जाती हैं प्‍यारी आंखें,
छीन लेती हैं हमें हमसे तुम्‍हारी आंखें।
एक नशा हम पे भी छा जाता है तुमसे मिलकर,
खूब भाती हैं हमें तेरी खुमारी आंखें।
हार बैठा हूं तेरे प्‍यार में दिल की बाजी,
जीतने देती नहीं मुझको जुआरी आंखें।
क्‍या असर प्‍यार में होता है,पता आज चला,
प्‍यार के रंग में दिखती हैं पुजारी आंखें।
फासले से तो बहुत शोख नजर आती हैं,
रू-बरू बनके जो रहती हैं बेचारी आंखें।
क्‍या पता तुमको के फुरकत में गुजरती क्‍या है,
ढूंढती रहती हैं तुमको ये हमारी आंखें।


सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

नाम उसका है


मैंने माँगा जिसे दुआओं में,
नाम उसका है बेवफाओं में.
या खुदा कैसा दौर आया है,
दर्द ही दर्द है सदाओं में.
वक़्त ने उनके पर क़तर ही दिए,
उड़ते रहते थे जो हवाओं में.
उम्र भर कुछ न कर सके हासिल,
हम जो उलझे रहे अदाओं में.
उस-सा कोई,कहीं मिला न मुझे,
लाख ढूंढा उसे खुदाओं में.
"राज" क्यों दुश्मनो से डरते हो,
ज़हर तो है यहाँ हवाओं में.